सरकारी तंत्र में सुधार: आवश्यकता है प्रशासनिक सुधारों की

पिछले कुछ दशकों में अर्थव्यवस्था और समाज में भारतीय राज्य की भूमिका के बारे में सार्वजनिक विमर्श एक गलत परिपाटी पर चला गया है। नेहरूवादी राज्य और समाजवादी नीतियों की विफलता ने सरकार और विशेष रूप से सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया को उत्पन्न किया। लाइसेंस-कोटा परमिट राज, अक्षम नौकरशाही और बेलगाम भ्रष्टाचार ने सरकारी व्यवस्था के विरुद्ध माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके चलते सरकार को समस्या के समाधान नहीं, बल्कि समस्या के जनक के रूप में देखा जाने लगा। इसका एक नतीजा यह भी हुआ कि 1990 के दशक के बाद से सरकार के आकार को कम करने का तर्क व्यापक समर्थन पाने लगा। खासतौर पर शहरी मध्य वर्ग और नीति निर्माताओं द्वारा सरकार में सुधार करने की वकालत की जाने लगी। महत्वपूर्ण मुद्दा यह बना कि सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्रों में अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या को कम करना है। इसके पीछे यह धारणा काम कर रही थी कि सरकारी क्षेत्र में जरूरत से ज्यादा नौकरियां हैं, जिन्हेंं कम करके सरकारी घाटे को कम किया जा सकता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत में सार्वजनिक क्षेत्र का रोजगार -अनुपात दुनिया में सबसे कम है।

भारत में सरकारी कर्मचारी रेलवे, डाक विभाग में सर्वाधिक

सातवें वेतन आयोग के अनुसार अगर रेलवे और डाक विभाग को निकल दिया जाए तो प्रत्येक 1,00,000 लोगों के लिए केवल 139 सरकारी कर्मचारी हैं। इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे बाजारवादी और कथित तौर पर न्यूनतम सरकार वाले देश में प्रति 1,00,000 निवासियों पर 668 सरकारी कर्मचारी हैं। भारत में ज्यादातर सरकारी कर्मचारी रेलवे, डाक विभाग, गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के तहत काम करते हैं, जबकि स्वास्थ्य, शिक्षा और शहरी विकास जैसे क्षेत्रों में सरकारी कर्मचारियों की संख्या न के बराबर है।

उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 38 फीसद पद खाली हैं

वर्ष 2014 में अकेले केंद्र सरकार के स्तर पर 7,50,000 रिक्तियां थीं। उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के लगभग 38 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। राज्यों की नौकरशाही में वर्षों से मध्यम स्तर के पदों पर भर्ती नहीं होने के कारण पूरा सरकारी तंत्र ही विलुप्त होता जा रहा है। इसे देखते हुए सरकारी नौकरियों में कटौती करने के बजाय भारत को राज्य की क्षमता में वृद्धि करने की आवश्यकता है। यह समझा जाना चाहिए कि सार्वजनिक क्षेत्र में सुधार का अभिप्राय कर्मचारियों की संख्या में कटौती करना नहीं है। आवश्यकता तो उसका पुनर्गठन करने की है। समस्या यह है कि सरकार को जिस क्षेत्र में होना चाहिए, वहां नहीं है और बेवजह के ऐसे सरकारी विभागों का बोलबाला है, जिनकी आवश्यकता नहीं है, लेकिन मुश्किल यह है कि समाजवादी समय की बनाई हुई व्यवस्था आज तक चली आ रही है।

पुलिस और शिक्षा विभाग में बड़े पैमाने पर रिक्तियां

जिस तरह पुलिस के तमाम पद रिक्त हैं, उसी तरह स्कूलों में बड़े पैमाने पर रिक्तियां हैं। यदि सभी राज्यों को मिला दिया जाए तो अकेले स्कूलों में करीब दस लाख पद खाली पड़े हुए हैं। ग्रामीण और कृषि मंत्रालय में लगभग 30 प्रतिशत रिक्तियां हैं, जिनमें अधिकांश का कार्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं को लागू करने का है। यहां तक कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लंबे समय से नियुक्तियां नहीं हो रही हैं। कुछ मामलों में 50 प्रतिशत से अधिक रिक्तियां हैं। राज्य स्तर के विश्वविद्यालयों की स्थिति इतनी दयनीय है कि बात न करना ही बेहतर है।

अधिक न्यायाधीश होंगे तो न्याय जल्द मिलेगा

अगर देश में पुलिस, स्कूल, अस्पतालों में लाखों रिक्तियां हैं तो इसका मतलब है कि भारतीय राज्य का अस्तित्व सिर्फ कागजों में है। आखिर ऐसे में सरकार का आकार कम करने की बात ही कहां आती है? जब सरकार सिर्फ नाममात्र के लिए हो तो उसका आकार कम करना न्यायसंगत कैसे हो सकता है? किसी के लिए भी यह बुनियादी बात समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि अगर अधिक न्यायाधीश होंगे तो हमारी न्यायिक प्रणाली तेजी से न्याय देना सुनिश्चित करेगी। इसी तरह अधिक पुलिसकर्मियों का मतलब बेहतर कानून एवं व्यवस्था से होगा। इसी क्रम में और अधिक डॉक्टरों का मतलब होगा आम आदमी के स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल। स्कूलों और कॉलेजों में सही पढ़ाई होने से देश का मानव संसाधन कहीं अधिक सक्षम और बेहतर होगा। ये सभी पद आर्थिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। केवल कल्पना की दुनिया में ही ये पद आर्थिक विकास पर बोझ माने जा सकते हैं।

नौकरशाही के हाथों में मनमानी शक्तियां

सरकारी तंत्र में सुधार का यह मतलब नहीं और न हो सकता है कि सरकारी तंत्र को ही समाप्त कर दिया जाए। सरकारी कर्मचारियों को उचित मानदंड देने में असमर्थता या अनिच्छा का मतलब यह नहीं है कि सरकार लोगों को काम पर रखना ही बंद कर दे। दरअसल समस्या कभी भी सरकारी कर्मचारियों की संख्या की नहीं रही है। वह तो हमेशा ही बेहद कम रही है। बतौर उदाहरण मात्र पचास लाख की आबादी वाले छोटे से सिंगापुर की विदेश सेवा में भारत के विदेश सेवा विभाग से ज्यादा अधिकारी हैं। असली समस्या नौकरशाही के हाथों में अत्यधिक और मनमानी शक्तियों की है।

लॉकडाउन के दौरान नौकरशाही ने अराजकता की स्थिति पैदा कर दी थी

महामारी कोविड-19 के दौरान हमने नौकरशाही राज को देखा कि उसने किस तरह चार महीने के अंदर लॉकडाउन संबंधी सैकड़ों नियम जारी कर एक तरह से अराजकता की स्थिति पैदा कर दी थी। भारत में सरकार का आकार ज्यादा बड़ा इसलिए लगता है, क्योंकि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के पास अनाप-शनाप शक्तियां हैं। इन शक्तियों के चलते वे निजी क्षेत्र और आम नागरिकों को परेशान करने में सक्षम हैं।

आवश्यकता प्रशासनिक सुधारों की है

स्पष्ट है कि आवश्यकता प्रशासनिक सुधारों की है। इसी तरह जरूरत नियम-कानूनों के आधुनिकीकरण की व्यवस्था एवं प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने की भी है, न कि सरकारी नौकरियों को ही समाप्त कर देने की। यह समस्या कोई हाल में उत्पन्न हुई हो, ऐसा भी नहीं है। पिछले दो दशकों से अधिक समय से एक के बाद एक सरकारें अपनी नीतिगत अक्षमता या अनिच्छा के कारण रिक्त पदों को भरने में अक्षम रही हैं। इस समस्या का समाधान केंद्र और राज्य सरकारों के समन्वय से ही हो सकता है। यह समन्वय कायम होना चाहिए और उन पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरना चाहिए जिनसे सरकार की कार्य क्षमता में वृद्धि हो।

abhinav prakash : (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं )

 

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