समय के साथ चल नहीं पा रही है हिंदी कहानी पिछड़ती नजर आ रही

इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक समाप्त हो गया और अब हम तीसरे दशक में प्रवेश कर चुके हैं। रचनात्मक लेखन में भी इन दो दशकों में कई बदलाव देखने को मिले। कुछ लेखकों ने अपनी कहानियों में या उपन्यासों में नए प्रयोग किए, भाषा के स्तर पर भी और कथ्य के स्तर पर भी। बावजूद इसके हिंदी में साहित्य के जितने पाठक होने चाहिए वो नहीं हैं। कहानी, कविता, उपन्यास से लेकर आलोचना और निबंध आदि की पुस्तकों की बिक्री के आंकड़े उत्साहजनक नहीं हैं।

कई बार ये कहा जाता है कि पुस्तकों की बिक्री के आंकड़े जानने का कोई वैज्ञानिक तरीका हमारे पास नहीं है इस वजह से ये भ्रम बनता है। हो सकता है कि इसमें सचाई हो लेकिन अगर पुस्तकों की बिक्री होती है तो इसके संकेत तो मिलने ही लगते हैं। सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ का उदाहरण दिया जा सकता है। खैर ये अलग विषय है जिसपर फिर कभी चर्चा होगी।

अभी हम बात कर रहे हैं कि हिंदी में कहानियों या उपन्यासों के लेखन प्रविधि में कोई बदलाव हुआ या नहीं। भाषा के स्तर पर कोई नया प्रयोग हुआ कि नहीं। अगर हम सबसे पहले कहानी की बात करें तो मुझे लगता है कि हिंदी कहानी की दुनिया बहुत नहीं बदली। हिंदी कहानी समय के साथ चल नहीं पा रही है और पिछड़ती नजर आ रही है। आज के ज्यादातर कहानीकार अब भी बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लिखी गई कहानियों के विषय से अलग जाकर कोई नवोन्मेष करते नहीं दिख रहे। हिंदी की कहानियां गावों से मुक्त नहीं हो पाई है। हिंदी कहानी गांव की भाषा से भी कहां मुक्त हो पाई है।

जब हम हिंदी कहानी के कम होते पाठक की बात करते हैं तो तमाम साहित्यिक गुणों और अवगुणों की चर्चा करते हैं लेकिन एक बेहद महत्वपूर्ण बात की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता है। हिंदी के कहानीकार ऐसे दोष का शिकार हो रहे हैं जिसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है। हिंदी के कहानीकार अब भी गांव भी भाषा लिख रहे हैं जबकि कहानी की पहुंच शहरी पाठक तक अधिक है।

ज्यादातर कहानियां गांव की पृष्ठभूमि पर लिखी जा रही हैं जबकि उनकी पहुंच शहरी पाठकों तक अपेक्षाकृत अधिक है। हिंदी के ज्यादातर कहानीकार अपनी कहानियों में अपने पात्रों को उन घटनाओं और परिस्थियों से मुठभेड़ करवाते हैं जो गांव की होती हैं। शहरी घटनाओं और शहरी परिस्थितियों को चित्रित करने का हुनर अभी हिंदी के कम कहानीकारों के पास है।

परिणाम ये होता है कि शहरी पाठक गांव की भाषा और परिस्थितियों या घटनाओं से अपना तादात्म्य नहीं बना पाता है और वो हिंदी कहानी से विमुख होने लगते हैं। शहरी पाठक को इस वजह से रेखांकित कर रहा हूं क्योंकि साहित्यिक कृतियों की पहुंच गांवों की अपेक्षा शहरों में अधिक है। गांवों और कस्बों में पुस्तकों की दुकानें कम हो रही हैं, कम तो शहरों में भी हैं लेकिन शहरी इलाकों में ऑनलाइन या ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म इस कमी को बहुत हद तक पूरा कर देते हैं।

हिंदी के कहानीकारों को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। हिंदी के कुछ कहानीकारों ने शुरुआती कहानियों में शहरी परिवेश को उठाया लेकिन फिर वो गांव चले गए। हिंदी कहानी की इस स्थिति को देखते हुए मुझे फ्रांसीसी कथाकार सार्त्र का एक कथन याद पड़ता है। सार्त्र ने कभी कहा था कि वो एक ऐसे लेखक हैं जिनको इस बात की चिंता है कि उनके पाठक तो हैं पर पब्लिक नहीं है (वी हैव रीडर्स बट वी हैव नो पब्लिक)।

सार्त्र अपने पाठकों से आगे जाकर अपने लिए जनता की तलाश करते हैं उसके लिए प्रयत्न करते हैं। लेखन के स्तर पर भी और पाठकों से आत्मीयता बढ़ाने के अन्य काम करते हुए भी। लेकिन हिंदी के कहानीकार अपने पाठकों की ही बहुत अधिक चिंता नहीं करते हैं तो उनसे ये अपेक्षा करना, कि वो अपनी रचनाओं के लिए ‘पब्लिक’ की तलाश करेंगे, व्यर्थ है।

यही हाल हिंदी के उपन्यासों का भी है। जहां तक उपन्यासों की पहुंच है वहां की भाषा में उपन्यास कम लिखे जा रहे हैं। हिंदी के पाठक हैं, वो पढ़ना भी चाहते हैं लेकिन उनको उनकी पसंद की सामग्री नहीं मिल पाती है। आज भी हिंदी में लिखे जा रहे अधिकांश उपन्यासों की कथावस्तु या उसकी भाषा काफी पुरानी हो गई है। हिंदी उपन्यास भी हिंदी कहानियों की तरह गांव से बाहर नहीं निकल पा रही है। उपन्यासों में गांव में आ रहे बदलावों को रेखांकित नहीं किया जा रहा है।

समकालीनता की हिंदी में बहुत बातें होती है लेकिन लेखन को समकालीन बनाने के लिए वैसे विषय नहीं उठाए जाते हैं। कोरोना काल में जिस तरह से शहरों में काम करनेवाले लोग अपने गांव की ओर लौटे, उसने गांव का पूरा समीकरण बदल दिया। पारिवारिक से लेकर सामाजिक संरचना पर असर पड़ा लेकिन हिंदी कहानी या हिंदी उपन्यास इस बदलाव को अबतक नहीं पकड़ पाई है। इसके पहले की सामाजिक घटनाओं को भी समकालीन हिंदी रचनाशीलता में स्थान नहीं बना पाई है।

दो चार लेखक लिखते तो हैं लेकिन वो पर्याप्त नहीं माना जा सकता है। यह अनायास नहीं है कि हिंदी में विभाजन पर बहुत ज्यादा नहीं लिखा गया, न ही उसकी त्रासदी पर और ना ही उसके सामाजिक असर पर। यशपाल और भीष्म साहनी ने लिखा जरूर पर इतनी बड़ी त्रासदी के लिए वो बहुत कम है। भारत का विभाजन मानवता के इतिहास में सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है।

इस बात पर हिंदी के साहित्यकारों को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि समय को पकड़ पाने और उसको अपनी रचनाओं में उतार पाने में वो क्यों पिछड़ जा रहे हैं। इक्सीवीं शताब्दी के दूसरे दशक में हिंदी में कुछ नए लेखक आए जिन्होंने अपनी रचनाओं में शहरी युवाओं की कहानियां उनकी भाषा में लिखीं। पाठकों ने ऐसे लेखकों को पसंद भी किया।

उनके उपन्यासों को लेकर साहित्य जगत में चर्चा भी हुई लेकिन वो अपनी ही बनाए खांचे को तोड़कर बाहर नहीं निकल पाए और खुद को दोहराने लगे। विश्वविद्यालय कैंपस से बाहर निकलते ही उनके लेखन की सीमाएं सामने आ गईं।

इससे इतर अगर हम देखें तो सिनेमा ने बदलते हुए समय को पकड़ा। जब व्यवस्था से विद्रोह की बात थी तो एंग्री यंग मैन आया। जब देश में उदारीकरण की आहट सुनाई देने लगी तो तो हिंदी सिनेमा में एंग्री यंग मैन की जगह ऐसे नायक ने ले ली जो कॉलेज का छात्र है। उसके अपने सपने हैं, वो अपने फैसले खुद लेना चाहता है। फिर जब हिंदी सिनेमा इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करता है तो उसकी कहानियां फिर बदलती हैं और वो शहरों की यथार्थवादी कहानियों तक आता है।

समाज में प्रचलित उन मुद्दों पर फिल्में बनने लगती हैं जिसपर कम बात होती थी। फिल्मों में संवाद की भाषा बदलती है, गानों के बोल बदलते हैं। विकी डोनर, पीकू, दम लगाके हईसा, बैंड बाजा बारात, लेडीज वर्सेज रिकी बहल से लेकर गली बॉय तक पहुंचती है। इस बदलाव को लोगों ने पसंद भी किया और फिल्में हिंट भी हुईं। सार्त्र के शब्द उधार लेकर अगर कहें तो इन फिल्मों को ‘पब्लिक’ भी मिली।

हिंदी कहानीकारों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो समय के साथ चलें और उन पाठकों का ध्यान रखें जहां तक उनकी रचनाएं पहुंच सकती हैं। अगर ऐसा हो पाता है तो वो हिंदी कथा जगत के लिए एक आदर्श स्थिति होगी। अन्यथा हिंदी कहानी भी उसी गति को प्राप्त हो जाएगी जिस गति को हिंदी की आर्ट फिल्में प्राप्त हुईं।

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