कांग्रेस के 135वें स्थापना दिवस पर नहीं दिखा उत्साह, सोनिया-राहुल नदारत, पार्टी नेतृत्व जमीनी हकीकत से अपरिचित

कांग्रेस ने जिस तरह अपना स्थापना दिवस मनाया, उससे यह नहीं लगता कि उससे पार्टी में किसी तरह के उत्साह का संचार हुआ होगा। कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्थापना दिवस समारोह में न तो सोनिया गांधी उपस्थित हुईं और न ही राहुल गांधी। कांग्रेस प्रवक्ता की ओर से राहुल के बारे में यह सूचना दी गई कि वह निजी यात्रा पर विदेश गए हुए हैं, लेकिन यह काम तब किया गया जब उनके इटली चले जाने के बारे में तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे थे। नि:संदेह यह निजी यात्रा आवश्यक रही होगी, लेकिन क्या इसके बारे में राहुल स्वयं सूचित नहीं कर सकते थे? निजी यात्रा पर विदेश जाना कोई ऐसा काम नहीं, जिसे गोपनीय रखा जाए। बेहतर होता कि बात-बात पर ट्वीट करने वाले राहुल अपनी इस यात्रा को लेकर भी एक ट्वीट कर देते अथवा पार्टी की ओर से समय रहते इस बारे में जानकारी दे दी जाती। क्या यह अजीब नहीं कि यह जानकारी तब दी गई जब तरह-तरह के सवाल उठने लगे?

पार्टी की स्थापना के 135 साल पूरे होने के अवसर पर सोनिया गांधी की ओर से जो वीडियो संदेश जारी किया गया, उसमें आजादी के संघर्ष में कांग्रेस की भागीदारी का जिक्र करते हुए यह भी कहा गया कि आज वैसे ही हालात हैं, जैसे आजादी के पहले थे। यह समझ आता है कि कांग्रेस को मोदी सरकार फूटी आंख नहीं सुहाती, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को अंग्रेजी सत्ता के समय जैसी बताना भारत की जनता और साथ ही भारतीय लोकतंत्र का अपमान है। सोनिया गांधी की मानें तो आज चारों ओर तानाशाही का आलम है और लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक संस्थाओं को खत्म किया जा रहा है। ऐसे वक्तव्य तो यही बताते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व किस तरह जमीनी हकीकत से अपरिचित है। सोनिया गांधी के राहुल गांधी सरीखे बयान यह भी प्रकट करते हैं कि वह किस प्रकार उन बातों को समझने के लिए तैयार नहीं, जिनका जिक्र पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं ने करीब चार माह पहले एक चिट्ठी में किया था। कांग्रेस को यह समझ आए तो बेहतर कि इस तरह की रट लगाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं कि मोदी सरकार के चलते हर तरफ गहन संकट छा गया है। क्या कांग्रेस के संकट के लिए भी मोदी सरकार जिम्मेदार है? यदि नहीं तो फिर वह बीते एक साल से नेतृत्व के मसले को सुलझाने में क्यों नाकाम है? अच्छा हो कि कांग्रेस को यह अहसास हो कि वह एक जिम्मेदार विपक्षी दल की तरह व्यवहार नहीं कर रही है और इसका एक बड़ा कारण गांधी परिवार की ओर से पार्टी को निजी जागीर की तरह चलाना है।

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