सब्सिडी नहीं राशि सीधे जनता को दे, जिससे लोगों की क्रय शक्ति बढ़ सके

सरकार को ब्याज पर 100 रुपये सब्सिडी देने के स्थान पर वही 100 रुपये सीधे जनता को ट्रांसफर करने चाहिए जिससे जनता की क्रय शक्ति बढ़े। बाजार में मांग बने और उद्यमियों के लिए उत्पादन लाभप्रद हो जाए। इस समय की प्रमुख चुनौती बाजार में मांग पैदा करना है।

भरत झुनझुनवाला

गत सप्ताह सरकार ने छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दरों में कटौती करके उसे तत्काल वापस भी ले लिया। दरअसल सरकार द्वारा ब्याज दरें घटाने पर बहुत तीखी प्रतिक्रियाएं आई थीं जबकि हकीकत यही है कि उनमें कटौती से जमाकर्ताओं के हितों पर कोई बड़ा आघात नहीं होता। इसे इस प्रकार समझना होगा कि महंगाई दर में कमी के साथ-साथ ब्याज दरों में कटौती करना आवश्यक हो जाता है। जैसे वर्ष 2020 में राष्ट्रीय बचत पत्र पर 7.9 प्रतिशत ब्याज मिलता था जबकि महंगाई दर 4.9 प्रतिशत थी। यानी जमाकर्ता को तीन प्रतिशत का शुद्ध ब्याज मिलता था।

ब्याज दर में कटौती से जमाकर्ता को वास्तविक नुकसान नहीं

सिद्धांत यही है कि महंगाई जितनी बढ़ती है उतना ही आपके द्वारा जमा की गई रकम का वास्तविक मूल्य घट जाता है। जैसे इस वर्ष आपने 100 रुपये जमा कराए और महंगाई दर पांच प्रतिशत हो तो एक वर्ष बाद उसी 100 रुपये में आपको केवल 95 रुपये का सामान मिलेगा। इसीलिए जमाकर्ता को शुद्ध ब्याज दर पर ध्यान देना चाहिए। वर्तमान में महंगाई दर घटकर 3.7 प्रतिशत हो गई है। इसलिए यदि ब्याज दर न घटाई जाए तो जमाकर्ता को मिलने वाले शुद्ध ब्याज की दर तीन से बढ़कर 4.2 प्रतिशत हो जाएगी। जमाकर्ता को पूर्व की तरह 7.9 प्रतिशत ब्याज मिलेगा, लेकिन महंगाई दर घटकर 3.7 हो जाने से उसके हाथ में 4.2 प्रतिशत का ब्याज आएगा। सरकार ने ब्याज दर को घटाकर 7.9 से 6.8 प्रतिशत कर दिया था। यदि इस घटी हुई ब्याज दर को लागू किया गया होता तो भी इसमें से 3.7 प्रतिशत मुद्रास्फीति समायोजन के बाद जमाकर्ता को 3.1 प्रतिशत शुद्ध ब्याज मिलता जो कि पिछले वर्ष के तीन प्रतिशत के समकक्ष है। इसलिए ब्याज दर में कटौती से जमाकर्ता को वास्तविक नुकसान नहीं है।

बैंकों में अधिक जमाराशि आकर्षित हो और बैंक आर्थिक गतिविधियों को गति दे सकें

ब्याज दर घटाने का दूसरा कारण यही था कि इन बचत योजनाओं में जमा राशि से मुख्यत: सरकार द्वारा ऋण लिया जाता है। वहीं अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जरूरी है कि बैंकों के पास ज्यादा रकम जमा हो जिससे वे उद्यमियों को अधिक मात्रा में ऋण दे सकें। वैसे भी सरकार द्वारा लिया गया ऋण मूलत: सरकारी खपत में जाता है, जबकि बैंकों की जमाराशि सामान्यतया अन्य उत्पादक गतिविधियों में लगाई जाती है। समस्या यह है कि छोटी बचत योजना में 7.9 प्रतिशत का ब्याज मिलता है जबकि स्टेट बैंक में पांच वर्ष की जमा पर 5.40 प्रतिशत ब्याज ही मिलता है। इसलिए जमाकर्ता के लिए बैंक में राशि जमा कराना लाभकारी नहीं है। इससे बैंकों में जमाराशि कम आने के कारण उनके द्वारा उत्पादक गतिविधियों को ऋण कम दिया जाता है। इसलिए जरूरी था कि छोटी बचत पर ब्याज दरों को घटाया जाए जिससे बैंकों में अधिक जमाराशि आकर्षित हो और बैंक आर्थिक गतिविधियों को गति दे सकें।

छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर में कटौती का फैसला तार्किक था

ब्याज दर में कटौती का तीसरा आधार यह था कि सरकार द्वारा सीधे बाजार से जो ऋण लिया जाता है, जिसे सरकारी प्रतिभूति या जीसैक कहा जाता है, उस पर सरकार 6.2 प्रतिशत का ब्याज अदा कर रही है। इसका अर्थ है कि सरकार को 6.2 प्रतिशत की दर पर बाजार में ऋण उपलब्ध है जबकि छोटी बचत योजनाओं में 7.9 प्रतिशत का ब्याज देना पड़ रहा है। यानी इससे सरकार पर 1.7 प्रतिशत का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। इसका वहन सरकार को करदाताओं के पैसे से ही करना पड़ता है। यानी कुछ जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा समस्त करदाताओं के पैसों से होती है। बिल्कुल वैसे जैसे घर के दो बच्चों का हिस्सा काटकर उसे तीसरे बच्चे को दे दिया जाए, जो कि अनुचित है। इन कारणों से देखा जाए तो सरकार द्वारा छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर में कटौती का फैसला तार्किक ही था, लेकिन कुछ कारणों से सरकार ने उस निर्णय को पलट दिया।

मांग में गिरावट: उद्यमी के लिए ऋण लेकर निवेश करना लाभप्रद नहीं

इस बीच चिंता का कहीं बड़ा विषय पिछले कुछ समय से हमारी विकास दर का गिरना है। कोविड से इस पर संकट और गहराया है। वर्तमान में कोविड की दूसरी लहर से हालात और बिगड़ने की आशंका बढ़ रही है। बाजार में मांग नहीं है। जैसे दुकानदार की दुकानदारी यदि 25 प्रतिशत कम होती है तो उसके लाभ कम होते हैं और उसके द्वारा अपनी खपत के लिए बाजार से माल की खरीद भी कम की जाती है। मांग में इस गिरावट का नतीजा है कि उद्यमी के लिए ऋण लेकर निवेश करना लाभप्रद नहीं रह गया है। उद्यमी कागज बनाने का कारखाना लगाने के लिए बैंक से ऋण तब लेगा जब बाजार में कागज की मांग हो। अन्यथा वह व्यर्थ में लिए गए ऋण पर ब्याज के बोझ से और पिछड़ता जाएगा। वर्तमान में कागज की जितनी मांग है उससे अधिक उत्पादन की क्षमता उद्यमियों के पास है। इसलिए ब्याज दर शून्य भी हो जाए तो भी उद्यमी ऋण लेकर निवेश नहीं करेगा, क्योंकि नए निवेश से उत्पादित कागज को बेच पाना उसके लिए संभव नहीं होगा। गौर करना चाहिए कि जापान आदि देशों में ब्याज दर शून्य होने के बावजूद वहां आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती कायम है।

मोदी सरकार ने कोविड संकट से निजात पाने के लिए ऋण देने की दिशा में कई कदम उठाए

ऐसे हालात को देखते हुए सरकार ने कोविड संकट से निजात पाने के लिए ऋण देने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। छोटे उद्योगों, किसानों एवं अन्य तमाम लोगों के लिए ऋण लेना आसान बना दिया गया है। ब्याज दर भी कम कर दी गई है, लेकिन बाजार में मांग के अभाव में सब व्यर्थ है। मिसाल के तौर सरकारी योजना के अंतर्गत रेहड़ी-पटरी वालों को 10 हजार रुपये तक का ऋण दिया जा रहा है, लेकिन उनका काम-धंधा सिकुड़ रहा है। ऐसे में यही आसार अधिक हैं कि वे ऋण का उपभोग निजी जरूरतों के लिए करेंगे। इससे या तो ऋण वसूल नहीं हो पाएगा या ऋण लेने वालों की मुश्किलें और बढ़ेंगी, क्योंकि उन्हें ब्याज भी अदा करना होगा। इसलिए सरकार को ब्याज दर में कटौती करके और ऋण का वितरण कर अर्थव्यवस्था को पुन: चलाने की नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। इसके बजाय अमेरिका की तर्ज पर नकदी मुहैया कराने की संभावनाएं तलाशी जाएं। सरकार को ब्याज पर 100 रुपये सब्सिडी देने के स्थान पर वही 100 रुपये सीधे जनता को ट्रांसफर करने चाहिए जिससे जनता की क्रय शक्ति बढ़े। बाजार में मांग बने और उद्यमियों के लिए उत्पादन लाभप्रद हो जाए। इस समय की प्रमुख चुनौती बाजार में मांग पैदा करना है। ब्याज दर में कटौती एक उपाय अवश्य है, लेकिन यह अर्थव्यवस्था को पुन: स्फूर्ति प्रदान करने में अपेक्षित रूप से सफल नहीं होगा। –

भरत झुनझुनवाला (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं) 

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