लालू यादव को नया टेंशन… उड़ गई रातों की नींद

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से जुड़े चारा घोटाले के डोरंडा कोषागार से 139.5 करोड़ रुपये की अवैध निकासी मामले में सीबीआइ के विशेष जज एके मिश्रा की अदालत में सुनवाई अंतिम चरण में है।

तेजस्‍वी यादव (Tejashwi Yadav) के पिता बिहार के पूर्व मुख्‍यमंत्री राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ सकती हैं। चारा घोटाले (Fodder Scam, Chara Ghotala) के डोरंडा कोषागार (Doranda Treasury Case) से जुड़े 139.5 करोड़ रुपये अवैध निकासी मामले में सीबीआइ (CBI) के विशेष जज एके मिश्रा (Justice AK Mishra) की अदालत (CBI Special Court, Ranchi) में सुनवाई अंतिम चरण में है। शुक्रवार को भी अभियोजन पक्ष की ओर से बहस जारी रही। माना जा रहा है कि चारा घोटाले के इस सबसे बड़े मामले में भी लालू यादव (Lalu Yadav) को अदालत सजा सुना सकता है।

रांची के विशेष अदालत में सुनवाई के क्रम में सीबीआइ के विशेष लोक अभियोजक बीएमपी सिंह ने अदालत में सबसे बड़े चारा घोटाले की पृष्ठभूमि पर बिंदुवार चर्चा की। कोर्ट को बताया गया कि किस प्रकार इस घोटाले की साजिश रची गई, इसको छिपाने के लिए क्या-क्या तरीके अपनाये गए। कैसे छोटे अधिकारियों पर दबाव डाल कर पैसे की निकासी होते रही, क्रमश: बताया गया।

बीएमपी सिंह ने अदालत से यहां तक कहा कि ऐसा नहीं है इतना बड़ा घोटाला हो गया और किसी को कानों कान खबर नहीं हुई। अनियमितता हो रही है इसकी जानकारी सत्ता पक्ष के साथ-साथ अन्य महत्वपूर्ण लोगों को भी थी लेकिन सत्ताधीशों के ईशारे पर सबकुछ अनवरत जारी रहा। जब भी विधान सभा अथवा विधान परिषद में अनियमितता को लेकर प्रश्न पूछे जाते थे, सरकार सीधा जवाब नहीं देती थी।

अनियमितता पर पर्दा डालने के लिए बातों को इधर-उधर घुमा दिया जाता था। इस घोटाले में लोक-लेखा समिति की भूमिका भी कम संदेहास्पद नहीं रही। सरकार घोटाला की जांच के लिए भी समय पर अनुमति नहीं दी गई। बता दें कि कांड संख्या आरसी 47ए/96 में पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव सहित 110 बड़े राजनेता व नौकरशाह ट्राइल फेस कर रहे हैं। अगली बहस 23 मार्च को होगी।

एजी को भी समय पर नहीं मिलता था हिसाब-किताब की जानकारी

बीएमपी सिंह ने बहस के दौरान कहा कि जिस प्रकार फर्जी बिल पास होते गए उससे प्रतीत होता है कि डोरंडा कोषागार के कर्मियों को ऊपर से ऐसा करने का निर्देश मिला हो। और तो और पशुपालन से जुड़े हिसाब-किताब, बिल पेमेंट आदि की जानकारी एजी ऑफिस समय पर नहीं भेजे जाते थे। इतनी बड़ा षड्यंत्र तत्कालीन सरकार को चलाने वाले एवं बड़े नौकरशाहों की संलिप्तता के बिना संभव नहीं है।

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