ओवैसी की पार्टी के गुजरात में आने से मुस्लिम वोट बैंक साधने में लगी भाजपा-कांग्रेस

सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम के गुजरात में आने से जहां एक और कांग्रेस को अपना मुस्लिम मत बैंक खिसकने की चिंता सता रही है वही भाजपा को भी रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है। भरूच जिले की स्थानीय निकाय की 320 सीटों में से भाजपा ने 31 मुस्लिमों को अपना प्रत्याशी बनाया है। गुजरात में भारतीय जनता पार्टी शुरू से हिंदुत्ववादी एजेंडे के साथ मुस्लिम उम्मीदवारों से परहेज रखती आई है। लोकसभा चुनाव हो अथवा विधानसभा का चुनाव भाजपा ने पिछले 3 दशक में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा।

हालांकि आरएसएस समर्थक राष्ट्रीय मुस्लिम मंच गुजरात में भाजपा के लिए काम कर रहा है लेकिन मुस्लिम मंच भी अपने मुस्लिम समुदाय को भाजपा के पक्ष में लाने में तरह नाकाम रहा। भाजपा स्थानीय निकाय चुनाव में भी बड़ा ही सोच समझकर मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में लाती है। अहमदाबाद इस लिहाज से सबसे बड़ा उदाहरण है जहां भाजपा केवल मुस्लिम बहुल एरिया के किसी चर्चित व्यक्ति को टिकट देकर अपना सॉफ्ट कॉर्नर जताती रही है।

अहमदाबाद महानगर पालिका के पिछले चुनाव में भाजपा ने राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक को जुहापुरा में टिकट दिया लेकिन मुस्लिम होने के बावजूद भी भाजपा के टिकट पर चुनाव हार गए थे। भरूच कि जिला पंचायत 4 नगरपालिका तथा 9 तहसील पंचायत की 320 सीटों में से भाजपा ने 31 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। भरूच आदिवासी बहुल इलाका है तथा यहां पर एआइएमआइएम के गठबंधन में शामिल भारतीय ट्राइबल पार्टी की अच्छी पकड़ मानी जाती है।

बीटीपी के नेता विधायक छोटू वसावा पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन में थे लेकिन पिछले राज्यसभा चुनाव के दौरान उन्होंने भाजपा के पक्ष में मतदान करने का ऐलान कर दिया था। इसकी सबसे बड़ी वजह पिछले लोकसभा चुनाव में छोटू वसावा को भरूच से लोकसभा उम्मीदवार नहीं बनाना माना जाता है, उनका यह भी आरोप है कि कांग्रेस के दिवंगत नेता अहमद भाई पटेल ने उन्हें भरूच लोकसभा की सीट देने का वादा किया लेकिन बाद में आलाकमान इससे मुकर गया। कांग्रेस डीटीपी तथा एआइएमआइएम के गठबंधन से चिंतित नजर आती है लेकिन भारतीय जनता पार्टी को भी इस गठबंधन के चलते राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है और यही कारण है कि भाजपा ने ऐन चुनाव से पहले अपनी रणनीति में मुस्लिम तथा आदिवासी बहुल इलाकों में परिवर्तन कर आदिवासी तथा मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश की है।

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