हरियाणा में कांग्रेस विधायक के गले की फांस

हरियाणा के कांग्रेस विधायक प्रदीप चौधरी की विधानसभा सदस्‍यता आपराधिक मामले में तीन साल कैद की सजा सुनाए जाने के कारण चली गई। इसके बाद पूर्व कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी द्वारा केंद्र में यूपीए सरकार के समय अध्‍यादेश फाड़ने का मुद्दा सामने आ गया। राहुल गांधी ने जिस विधेयक की प्रतियों फाड़ी थीं वही आज प्रदीप चौधरी के लिए फांस बन गया।

रशीद मसूद और लालू यादव के बाद अब हरियाणा के प्रदीप चौधरी बने कानून का शिकार

सुप्रीम कोर्ट के आठ साल पुराने फैसले के आधार पर लोक प्रतिनिधित्व कानून के तहत सबसे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री रशीद मसूद इसका शिकार हुए थे। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव इस कानून का दूसरा शिकार बने। हरियाणा में कालका से विधायक प्रदीप चौधरी पहले ऐसे जनप्रतिनिधि हैं, जिन्हें विधानसभा की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा है। पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला सिर्फ इसलिए बचे रहे, क्योंकि उनकी सजा सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले की थी। रशीद मसूद और लालू यादव जब इस कानून की जद में आए, उस समय मसूद राज्यसभा सदस्य और लालू सांसद थे।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अध्यादेश लाना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस के ‘राजकुमार’ कहे जाने वाले पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भरे सदन में इस विधेयक की प्रतियां फाड़ डाली थी, जिसका पहला शिकार हरियाणा में प्रदीप चौधरी बन गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2013 के निर्णय से पहले ऐसे दोषी घोषित सांसदों व विधायकों को लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4 ) में तीन माह की समय अवधि की रियायत मिल जाती थी, जिस दौरान वे ऊपरी अदालत में अपील या पुनर्विचार याचिका दायर कर उनको दोषी घोषित करने वाले निचली अदालत के फैसल के विरूद्ध स्टे प्राप्त कर लेते थे। ऐसा करने पर उनकी सदन की सदस्यता बच जाती थी, परंतु अब ऐसा करना संभव नहीं है।

जुलाई 2013 में सुप्रीम कोर्ट के लिलि थामस निर्णय के बाद मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार एक अध्यादेश लाकर इस निर्णय को पलटना चाह रही थी। तब केंद्रीय कैबिनेट ने इस संबंध में एक अध्यादेश को मंजूरी दे दी, लेकिन राहुल गांधी ने उस अध्यादेश की कापी को ‘कंपलीट नानसेंस’ करार देते हुए न केवल खारिज किया, बल्कि इसके टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए थे। फिर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी ने अध्यादेश पर एतराज जता दिया और उस समय के केंद्रीय कानून मंत्री को अपने पास बुलाकर स्पष्टीकरण मांगा। इसके बाद अक्टूबर 2013 में ही मनमोहन सिंह की सरकार ने इस अध्यादेश को वापस लेने का निर्णय ले लिया था।

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार के अनुसार 10 जुलाई 2013 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय लिलि थामस बनाम भारत सरकार को सुप्रीम कोर्ट की ही एक संवैधानिक बेंच द्वारा मनोज नरूला बनाम भारत सरकार केस में सितंबर 2014 में सही ठहराया गया था।

उसके अनुसार अगर किसी मौजूदा सांसद या विधायक को किसी कोर्ट द्वारा लोक प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा (1), (2) एवं (3) में दोषी घोषित किया जाता है तो उन्हें धारा (4) में अपने पद के कारण किसी प्रकार की विशेष रियायत प्राप्त नहीं होगी एवं उन्हें अपनी संसद, राज्यसभा, विधानसभा अथवा विधान परिषद की सदस्यता से तत्काल हाथ धोना पड़ेगा।

इसलिए बच गए थे नवजोत सिंह सिद्धू

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के जुलाई, 2013 के निर्णय से पहले ऐसे दोषी घोषित सांसदों व विधायकों को इस कानून की धारा 8 (4 ) में तीन माह की समय अवधि की रियायत मिल जाती थी, मगर अब ऐसा संभव नहीं है। कालका के विधायक प्रदीप चौधरी के मामले में उन्हें दोषी घोषित कर कारावास की अवधि तीन वर्ष है, जो धारा 8 (3) में उल्लेखित दो वर्ष की अवधि से ऊपर है। इसलिए अगर प्रदीप चौधरी को सेशन कोर्ट से स्टे मिल भी जाता है तो उपरोक्त सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार उनकी विधानसभा की सदस्यता बहाल नहीं होगी। ढ़ाई वर्ष पूर्व मई 2018 में मौजूदा पंजाब विधानसभा में कांग्रेस विधायक नवजोत सिंह सिद्धू को सुप्रीम कोर्ट ने धारा 323 आइपीसी के तहत दोषी घोषित कर मात्र 1000 रुपये का जुर्माना लगा दिया, जिस कारण उनकी सदस्यता बच गई, क्योंकि यह सजा दो साल से कम थी।

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