अन्नदाता कोई व्यक्ति नहीं हो सकता, प्रकृति ही इस उच्च सम्मान की अधिकारी

अन्नदाता शब्द का जिस तरह से आजकल उपयोग हो रहा है वह ठीक नहीं है। अन्नदाता कोई व्यक्ति नहीं हो सकता, केवल प्रकृति ही इस उच्च सम्मान की अधिकारी है। धरती माता, जो इस चराचर जगत के सभी प्राणियों का का ध्यान रखती हैं, उनका कोई विकल्प नहीं हो सकता है। धरती माता मूल रूप से अन्न उगाती हैं, बाकी सभी लोग श्रमदाता हैं। जो व्यक्ति इस पर जिस भी तरीके से श्रम करता है, वह उसी प्रकार से मानव जाति के सुख और भरण-पोषण के लिए विभिन्न साधन पैदा करता है। एक उद्योगपति धरती माता के किसी भाग पर उद्योग लगाता है। उसमें जिस चीज का भी उत्पादन होता है, वह भी प्राणी मात्र के कल्याण के लिए ही होती है।

साफ है अन्नदाता का विशेषण किसी मनुष्य को नहीं दिया जा सकता। अन्नदाता तो केवल धरती माता ही हो सकती हैं, जो तरह-तरह की वनस्पतियां स्वयं उगाकर प्राणी मात्र को देती हैं। उसमें वायु, जल, सूर्य और आकाश का प्रताप भी शामिल होता है तब जाकर कहीं किसी चीज का उत्पादन होता है। क्या दवाइयां बनाने वाले विज्ञानी एवं उद्योग जीवनदाता नहीं कहे जा सकते? क्या डॉक्टर भगवान के बाद इस धरती पर उसका दूसरा रूप नहीं रखते? क्या इस कोरोना काल में सफाईकर्मियों से लेकर हर प्रकार के करोना योद्धाओं ने लोगों के जीवन को नहीं बचाया है? क्या उनको बचाने में सिर्फ खेती करने वाले ही सहायक थे? हमारे सुरक्षा बल, जो कोरोना नियमों का पालन कराने में अपना जीवन त्याग गए, उनको किस श्रेणी में रखा जाएगा? उनका यह बलिदान क्या किसी से कम है?

केवल एक वर्ग को एक विशेष विशेषण से नवाजने के कारण ही कुछ लोगों में अहंकार की भावना का उदय हुआ है। गणतंत्र दिवस पर जो उपद्रव हुआ, उसका एक बड़ा कारण यह भी है। दिल्ली में आंदोलन के नाम पर एक बहुत बड़ा सामाजिक अपराध हुआ है। इसमें शामिल लोगों की जांच की जानी चाहिए। देश या राष्ट्र के प्रति अपराध करने वाले, चाहे वे खेतों में काम करने वाले हों या उद्योगपति हों या सरकारी सेवा में काम करने वाले छोटे से लेकर बड़े स्तर तक के कर्मचारी हों या राजनीतिज्ञ हों, सभी अपराधी हैं। उन्हें किसी भी कीमत पर क्षमा नहीं किया जा सकता है। 26 जनवरी को दिल्ली में जो हुआ वह लोकतंत्र का भाग नहीं है। वह अराजकता है। लोकतंत्र केले की तरह नहीं होना चाहिए, जिसको कहीं से भी काटा जा सके। लोकतंत्र एक आम की तरह होना चाहिए जिसमें ऊपर से नरम मिठास होती है, मगर अंदर जाकर उसमें एक कठोर गुठली भी निकलती है, जिसको काटने से दांत टूट भी जाते हैं। ऐसे राष्ट्रक्षयी कार्यो को आंदोलन नहीं कहा जा सकता है। भारतीय जनमानस पूरी तरह इसका विरोध करता है और इनके नेताओं की भी निंदा करता है।

(लेखक रेलवे के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)

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