बिहार में राजनीतिक उम्‍मीदों का नया साल: विधायकों को कैबिनेट विस्तार का इंतजार, बदल सकते हैं सियासी समीकरण

हर नया साल नई उम्मीदें लेकर आता है। साल 2021 राज्य के लिए कुछ खास उम्मीदों वाला है। आम लोगों को उम्मीद है कि कोरोना का बुरा दौर खत्म होगा। उनसे कहीं अधिक उम्मीद राजनीतिक दलों को है। सत्तारूढ़ दल से जुड़े ढेर सारे विधायकों को नए साल में और खरमास खत्म होने के बाद मंत्री बनने की उम्मीद है। माना यही जा रहा है कि जल्द ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कैबिनेट का विस्तार होगा। राज्य कैबिनेट में इस समय मुख्यमंत्री सहित 15 सदस्य हैं। 21 नए मंत्रियों की गुंजाइश बची हुई है।

कामकाज पर नजर आ रहा कैबिनेट विस्तार नहीं होने का असर

कैबिनेट के विस्तार न होने का असर सरकारी कामकाज पर साफ नजर आ रहा है। मंत्रियों के पास चार-पांच विभाग हैं। उन्हें नहीं पता कि पास अंतत: कौन विभाग रह जाएगा। नतीजा, वे सभी विभागों में समान रूप से दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं।

विभागों में ठहराव का नजारा, उम्‍मीद है नए साल में आएगी गति

चुनिन्दा और जन सरोकार वाले कुछ विभागों को छोड़ दें तो ज्यादा विभागों में ठहराव का नजारा है। यह स्थिति विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के ठीक बाद जैसी है, जब आदर्श आचार संहिता के चलते सरकार नीतिगत निर्णय नहीं ले सकती थी। कुल मिलाकर सरकार, सचिवालय और राजनीतिक दलों के बीच ठहराव का माहौल है। उम्मीद है कि नए साल में गति आएगी।

सरकार के पास चुनावी घोषणाओं पर तेजी से अमल की चुनौती

सरकार के पास फिलहाल ढेर सारी नई योजनाएं बनाने का लक्ष्य नहीं है। हां, उन घोषणाओं पर तेजी से अमल करने की चुनौती है जो चुनाव के दिनों में की गई थीं। अच्छी बात यह है कि नए अवतार वाले सात निश्चय कार्यक्रम और 20 लाख लोगों को रोजगार देने की घोषणा पर अमल करने की कोशिश नजर आ रही है। बेशक, कोरोना का टीका भी सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण कार्यभार है। इसकी तैयारी भी चल रही है।

राजनीतिक बदलाव के संकेत

विधानसभा चुनाव के दौरान और चुनाव परिणाम के बाद इन राजनीतिक बदलाव की चर्चा तेज है। जाहिर है, यह नए साल में ही ठोस स्वरूप ले पाएगा। एक संकेत राज्य राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की संरचना में बदलाव का भी है। लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) को लेकर गठबंधन के घटक दलों में दुविधा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) को छोड़ अन्य घटक दल एलजेपी को लेकर सहज नहीं हैं। खासकर जनता दल यूनाइटेड (JDU) आधिकारिक तौर पर मान चुका है कि एलजेपी के चलते कई सीटों पर उसकी हार हुई। अरुणाचल प्रदेश में जेडीयू के छह विधायकों का बीजेपी में प्रवेश दोनों दलों के रिश्ते को राज्य में किस हद तक प्रभावित करेगा, यह भी नए साल में नजर आएगा। जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष बशिष्ठ नारायण सिंह कह रहे हैं- दर्द है। क्या जेडीयू नए साल में इस दर्द की दवा खोजेगा?

महागठबंधन में भी है टीस

विपक्षी महागठबंधन (Mahagathbandhan) में दर्द है और टीस भी। विपक्षी राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) को सरकार न बनाने का दर्द है। टीस यह कांग्रेस (Congress) के चलते सत्ता तक नहीं पहुंच पाए। आरजेडी आक्रामक है। कांग्रेस बचाव की मुद्रा में है। दोनों का स्थायी भाव क्या रहेगा, नए साल में इसे देखना हर किसी के लिए दिलचस्प होगा। फिलहाल तो कांग्रेसी आपस में ही लड़ रहे हैं। हार के लिए राजद के बदले एक दूसरे को जिम्मेवार ठहरा रहे हैं। एक बार हार की जिम्मेवारी तय कर लें, तब आगे की बात होगी।

कौन टूटेगा, किससे जुड़ेगा

इन दिनों कई दलों के विधायकों के टूटने और किसी खास दल से जुडऩे की चर्चा तेज है। आरजेडी जोर-शोर से दावा कर रहा है कि जेडीयू के विधायक टूट कर उससे जुड़ने के लिए बेताब हैं। इधर जेडीयू के कई महारथियों के बारे में बताया जा रहा है कि वे सब कांग्रेस और आरजेडी में आपरेशन की तैयारी में लगे हुए हैं। दोनों तरह के दावे के अपने लक्ष्य हैं। आरजेडी का लक्ष्य सरकार बनाना है। जेडीयू की चाहत यह हो सकती है कि तोड़फोड़ के जरिए एनडीए में पहले की तरह बड़े भाई की भूमिका में आ जाएं। कौन अपने लक्ष्य को हासिल कर पाता है, नया साल इस सवाल का भी जवाब देगा।

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