सुरक्षा परिषद में सुधार बना भारत का अहम कूटनीतिक एजेंडा, पीएम मोदी की अगुवाई में भारत अपनी मांग को लेकर हुआ मुखर

भारत काफी लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की स्थायी सदस्यता की दावेदारी करता है। पिछले कुछ महीनों के दौरान राजग सरकार ने इस मुद्दे को जिस तरह से अपनी वैश्विक कूटनीति का हिस्सा बनाया है, वैसा पहले नहीं देखा गया है। पीएम नरेंद्र मोदी की तरफ से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए हर एक भाषण में मौजूदा वैश्विक संगठनों में भारी बदलाव का आह्वान होता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर, संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि टीएस त्रिमूर्ति के अलावा दुनिया के तमाम देशों के राजनयिक इस उद्देश्य में नए सिरे से जुटे हुए हैं। दूसरे देशों के साथ होने वाले द्विपक्षीय सहयोग वार्ताओं से लेकर एससीओ, ब्रिक्स जैसे संगठनों में भी भारत के एजेंडे में सबसे ऊपर संयुक्त राष्ट्र में बदलाव का मुद्दा ही है।

हर अंतराष्ट्रीय मंच से यूएनएससी में बदलाव की हो रही है अपील

अगर पिछले 48 घंटों को ही देखें तो यह बात साफ हो जाती है। ब्रिक्स देशों की शिखर बैठक में पीएम नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन), विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) के साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) जैसे वैश्विक संगठनों के मौजूदा ढांचे पर सवाल उठाये और यहां तक कहा कि ये दुनिया में हो रहे बदलावों के मुताबिक अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। इनके गवर्नेस को लेकर सवाल उठ रहे हैं और ये संगठन 75 वर्ष पुरानी मानसिकता पर काम रहे हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलाव को सबसे जरूरी बताया।

एससीओ और आइजीएन में रखा संयु्क्त राष्ट्र में सुधार का मुद्दा 

हाल ही में 10 नवंबर, 2020 को शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर बैठक में भी मोदी ने इन्हीं मुद्दों को सामने रखा था। इन दोनों बैठकों में यूएनएससी के दो स्थाई सदस्य रूस और चीन के राष्ट्राध्यक्ष उपस्थित थे। मोदी के इस भाषण से कुछ ही घंटे पहले संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भारतीय राजदूत त्रिमूर्ति ने संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में बदलाव की राह में रोड़े अटकाने के लिए चीन पर निशाना साधा।

संयु्क्त राष्ट्र में सुधार के लिए सदस्य देशों के बीच गठित अंतर-सरकारी वार्ता (आइजीएन) को औपचारिक दर्जा नहीं देने के मुद्दे पर चीन को निशाने पर लेते हुए कहा, ‘चंद देश नहीं चाहते कि यूएन में कोई सुधार हो। इसलिए वो आईजीएन को हमेशा एक अनौपचारिक निकाय बना कर रखना चाहते हैं। आइजीएन में जो बातचीत होता है, उसका संयुक्त राष्ट्र के तहत आधिकारिक रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता है। इस वजह से यह गंभीर मंच नहीं बन पाया है। यह कुछ देशों की वजह से नहीं हो पाया है, जबकि अधिकांश देश स्थाई व गैर-स्थाई सदस्यता का विस्तार चाहते हैं।’

आइजीएन को आधिकारिक दर्जा देने और भारत को यूएनएससी का स्थाई सदस्य बनाये जाने पर इसके चार सदस्य देश (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस व रूस) राजी हैं लेकिन चीन इसके लिए तैयार नहीं है। त्रिमूर्ति के इस भाषण से कुछ घंटे पहले सोमवार को विदेश मंत्री जयशंकर ने डक्कन डायलॉग में कहा, ‘दुनिया एक और बड़ी घटना का इंतजार कर रही है। जिस तरह से एक घटना ने समूह-7 देशों के संगठन को सुधार कर समूह-20 देशों के संगठन के गठन की राह आसान की। अब कोई बड़ी घटना होगी, तभी यूएन जैसे दूसरे संगठनों में सुधार की शुरुआत होगी।’ कुछ दिन पहले ही संपन्न हुई भारत-अमेरिका टू प्लस टू वार्ता में भी विदेश मंत्री ने यह मुद्दा बहुत प्रमुखता से उठाई थी और बाद में दोनो देशों की तरफ से जारी संयुक्त बयान में भी इसे प्रमुखता से शामिल किया गया था। अमेरिका पहले से ही इस मुद्दे पर भारत का समर्थन करता है। बताते चलें कि जनवरी, 2021 से भारत दो वर्षो के लिए यूएनएससी का अस्थाई सदस्य निवार्चित हुआ है।

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