विकास की आंधी में उड़ते बादल, जल संचय की बात पर अमल करना जरूरी

हमारे पूर्वज सदियों से वर्षा जल रूपी निधि की बाट जोहते और इसका संरक्षण करते आए हैं। जलसंकट के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गोस्वामी तुलसीदास को याद करें कि क्या हम विकास के नशे में ‘खल वचन’ बोलेंगे?

सोपान जोशी। गोस्वामी तुलसीदास रचित ‘श्रीरामचरितमानस’ में जल व्यवस्था का एक यादगार वर्णन मिलता है। किष्किंधाकांड में लक्ष्मण को समझाने के लिए राम जल चक्र को रूपक बनाते हैं: ‘सरिता जल जलनिधि महुं जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई।।’ यानी नदियां समुद्र का पानी वापस समुद्र तक पहुंचाती हैं, ठीक वैसे ही जैसे जीव श्रीहरि से निकलता है और श्रीहरि में ही विलीन हो जाता है। यह कृतज्ञ दृष्टि है। इसमें यह स्वीकृति है कि सृष्टि ने हमें बनाया है, हमने सृष्टि को नहीं बनाया। यही भाव कई पुरानी संस्कृतियों में रहा है। कुरान की एक आयत में आता है: ‘इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलैही राजिऊन (हम अल्लाह से हैं और अल्लाह के पास जाना है)।’ कई पुरानी परंपराएं हमें याद दिलाती आई हैं कि मनुष्य सीमित है, किंतु सृष्टि असीम है। आधुनिक विज्ञान भी हमें आज यही बता रहा है।

तो क्या यह दृष्टि केवल हमारे महाकाव्यों और शास्त्रों में ही थी? नहीं, अगर ऐसा होता, तो हमारे पूर्वज इतने जतन से बादलों की बाट नहीं जोहते। घटाओं के आकार-प्रकार के अनुसार उनके लिए दसियों प्यार-भरे नाम नहीं रखते। वे बादलों का प्रसाद जोड़ने के लिए इतने सारे तालाब और कुएं-कुंड नहीं बनाते। केवल बस्तियों के आस-पास ही नहीं, घने जंगल के बीच में वन्य प्राणियों के लिए तालाब बनाना पुण्य का काम माना जाता रहा है। हर प्रयास किया जाता था कि बादलों से बरसने वाले पानी को जमीन के नीचे रोका जाए, ताकि वह धीरे-धीरे बहता रहे। हर धर्म, हर जाति, हर भाषा-क्षेत्र के लोगों ने यह काम किया।

आवश्यकतानुसार इस पानी को निकाला जाता था और इसका उपयोग होता था, लेकिन पानी पर कोई अपना जन्मसिद्ध अधिकार नहीं मानता था। यह तो सभी मानते थे कि सारा पानी ‘जलनिधि’ अर्थात सागर का है। समुद्र ही पानी को बादलों के रूप में जगह-जगह भेजता है। घटाओं में हमारे पूर्वजों ने समुद्र का संदेश देखा था। क्या ये पिछड़े हुए लोग थे? अविकसित थे? जैसे भी थे, पानी की किल्लत का रोना नहीं रोते थे। उनके जल स्रोत मैले पानी से दूषित नहीं थे। पवित्र कही जाने वाली नदियों में वे मल-मूत्र नहीं बहाते थे। आज हम सभी विकास की राह पर खुद को सृष्टि से बड़ा मानने लगे हैं। हर दल की सरकार विकास का वादा कर रही है, हर दल विकास के दलदल में ही अपना पानी तलाशता है। यह विकास के वर्चस्व का समय है, न तो धर्म का और न आधुनिक विज्ञान का!

विकास की इस कृतघ्न अर्थव्यवस्था में ऐसी नदी का मोल क्या है जिसमें साफ पानी बहता हो? या एक ऐसे तालाब का मूल्य, जिसकी जमीन पर कब्जा न हुआ हो और जिसमें मैला पानी न डाला जा रहा हो? या एक कुएं का, जिसमें ताजा पानी हो? अगर हमारे समय में इनका कोई मूल्य होता, तो हमारे जल स्रोत इतनी बुरी स्थिति में नहीं होते, जितनी कि वे आज हैं। विकास की राजनीति में स्वस्थ जल स्रोतों का कोई स्थान नहीं है। इंसान नदियों को निचोड़कर पानी निकालता है, फिर मैले पानी को उसमें डाल देता है। अगर नदी समुद्र का पानी उसमें लौटाती है, तो इसे आज के जल इंजीनियर पानी की बर्बादी कहते हैं।

विकास की अर्थव्यवस्था चौमासे को, मानसून को हेय दृष्टि से देखती है। सरकारी कागजों में अस्थिर मानसून पर हमारी निर्भरता को शाप बताया जाता है, उसे लगातार कोसा जाता है। बार-बार कहा जाता है कि मानसून की बेड़ियों को काटे बिना हमारा विकास नहीं हो सकता है। मशीनी उद्योग से बने इस मानस को हर वस्तु अपने कैलेंडर, अपनी घड़ी के हिसाब से चाहिए। उसकी अपेक्षा यह रहती है कि सृष्टि उसकी आकांक्षाओं के अनुसार चले। यह औद्योगिक व्यवस्था यूरोप में बनी है, जहां की ठंडी जलवायु और ताबड़तोड़ बरसात में पानी की किल्लत नहीं होती। हम गरम इलाके में हैं। हमारे यहां बारिश का कायदा अलग है। वह पल-पल में बदलता है और जगह-जगह के हिसाब से पलट भी जाता है। हमारी पारंपरिक जल व्यवस्थाएं चौमासे की चंचलता को लीला के भाव से देखती आई हैं। उनमें कठिनाइयों को खेल-खेल में सहने की हिम्मत रही है।

आज अंधाधुंध विकास के युग में वर्षा जल संचय की बात करना आंधी के सामने चिराग जलाना है। जब तक विकास के विध्वंसक रथ को रोका नहीं जाएगा, तब तक बारिश के पानी के संचय की हर सरकारी योजना औपचारिकता से ज्यादा कुछ नहीं होगी। आज हमारे सामने दो ही रास्ते हैं, पहला, कृतघ्न विकास के प्रदूषण का और दूसरा, सृष्टि के प्रति कृतज्ञता से जल स्रोतों को साफ रखने का। ये दोनों रास्ते एक नहीं हो सकते। यह निर्णय लेते समय हमें तुलसीदास जी की कृति को याद रखना चाहिए। क्या हम विकास के नशे में ‘खल के वचन’ बोलेंगे? या सज्जन सद्गुणों को ‘समिटि समिटि जल भरहि तलाबा’ की तरह अपने भीतर आने देंगे!

(लेखक गांधीवादी चिंतक व पर्यावरणविद् हैं)

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