कौन सुनेगा इनकी, न समाज में सम्‍मान और वैक्‍सीनेशन में भी शामिल नहीं ये लोग!

पूरी दुनिया में दो करोड़ कचरा बीनने वाले ऐसे लोग हैं जिन्‍हें प्रशासन से कोई तनख्‍वाह नहीं मिलती है। शहरों और कस्‍बों को साफ रखने में इनका योगदान कोई कम भी नहीं है। इसके बाद भी ये वैक्‍सीनेशन से दूर हैं।

पूरी दुनिया में करीब दो करोड़ लोग ऐसे हैं जो शहरों कस्‍बों को साफ करने के लिए किसी भी तरह की प्रशासन से तनख्‍वाह नहीं पाते हैं। इनके पास न पीने का साफ पानी होता है और न ही खुद को कचरा बीनने से होने वाले नुकसान से बचने का कोई उपाय। ये उन कर्मचारियों से अलग होते हैं जो नगर पालिका या प्रशासन के कर्मी होते हैं। ये पूरा दिन कचरा उठाते हैं बाद में इन्‍हें अलग करते हैं और अलग किए गए कचरे को बेचने से जो पैसा आता है वही इनकी कमाई भी होती है। इस तरह के कचरा बीनने वाले हर जग दिखाई देते हैं। दिल्‍ली की ही बात करें तो यहां भी इन्‍हें आसानी से देखा जा सकता है।

दिल्‍ली की सड़कों और गलियों के अलावा भलस्वा समेत दूसरी लैंडफिल साइट पर इनकी मौजूदगी लगभग हर समय बनी रहती है। भलस्‍वा लैंडफिल साइट की ही बात करें तो यहां पर हर रोज 2,300 टन से अधिक कचरा ट्रकों के जरिए डाला जाता है। आपको जानकर हैरत होगी कि ये साइट 50 फुटबॉल मैदान से भी बड़ी है। यहां पर कूड़े का पहाड लगातार ऊंचाई के नए रिकॉर्ड बना रहा है। मौजूदा समय में इसकी ऊंचाई करीब 17 मंजिल की बिल्डिंग की बराबर है। यहां पर कचरा बीनने वाले अनौपचारिक श्रमिक लगातार अपना काम करते रहते हैं। ये वो लोग है जो गरीब और अमीर देशों के शहरों को साफ रखने में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं फिर भी लाइन में सबसे पीछे रहते हैं। इन्‍हें सामाजिक तौर पर न तो कोई सुविधा ही मिलती है और न ही कोई सम्‍मान ये लोग पाते हैं। इतना ही नहीं कोरोना महामारी के दौर में इन लोगों को वैक्‍सीनेशन में शामिल नहीं किया जाता है। जबकि प्रशासन के तहत काम करने वाले कर्मचारी वैक्‍सीनेशन का हक पाते हैं।

चिंतन जो एक गैर-लाभकारी संस्था है, की चित्रा मुखर्जी कहती हैं कि कोरोना महामारी ने जोखिम को बढ़ा दिया है। कचरा बीनने वाले अनौपचारिक श्रमिकों में से कुछ के ही पास खुद को सुरक्षित रखने की चीजें हैं और पीने का साफ पानी है। लेकिन यदि इन्‍हें वैक्‍सीनेशन में शामिल नहीं किया गया तो इससे शहरों को नुकसान होगा और कोरोना महामारी पर लगाम लगाना भी मुश्किल होगा।

ऐसे ही अनौपचारिक कचरा बीनने वाले श्रमिकों में 46 साल की मनुवारा बेगम भी हैं जो दिल्ली के पांच सितारा होटल के पीछे एक झुग्गी बस्ती में रहती हैं। वो इस सामाजिक दूरी और असमानता को करीब से देखती हैं। चिंतन के मुताबिक मनुवारा जैसे अनगिनत लोग शहरों और कस्‍बों का कचरा साफ कर सरकार और प्रशासन के करीब 5 करोड़ डॉलर हर साल बचाते हैं।

इतना ही नहीं ये लोग कचरे को लैंडफिल स्थलों से जाने से रोकते हैं जिसकी वजह से कर करीब नौ लाख टन कार्बनडाईऑक्साइड खत्म हो जाती है। इसके बाद भी ये समाज का अहम हिस्‍सा नहीं माने जाते हैं और वैक्‍सीनेशन से दूर हो जाते हैं। मनुवारा बेगम ने एक ऑनलाइन याचिका दायर कर वैक्‍सीनेशन की मांग की है। वो सरकार और प्रशासन से पूछ रही हैं कि क्‍यों वो इसकी हकदार नहीं हैं। आपको बता दें कि मनुवारा समेत करोड़ों कचरा बीनने वाले अनौपचारिक श्रमिक कचरे को रिसाइकिल करने में अहम योगदान देते हैं।

मनुवारा की ही तरह सायरा बानो भी भलस्‍वा लैंडफिल साइट से कचरा बीनकर और उसको बेचकर अपने परिवार का पेट भरती है। लेकिन कोरोना महामारी का असर इनकी रोजाना होने वाली कमाई पर भी पड़ा है। अब ये घटकर आधी रह गई है। आपको बता दें कि भारत में 1 अप्रैल से 45 वर्ष की आयु से अधिक आयु वाले लोगों को वैक्‍सीन दी जाएगी। प्राइवेट अस्‍पतालों में इसकी कीमत 250 रुपये रखी गई है जबकि सरकारी अस्‍पतालों में ये फ्री है। बानों का कहना है कि आय आधी होने के बाद घर का खर्च ही मुश्किल से चल पाता है ऐसे में इतनी महंगी वैक्‍सीन को हम कैसे लगवाएंगे। बानो पहले एक दिन में 400 रुपये तक कमा लेती थीं लेकिन अब केवल 200-300 रुपये तक ही कमा पाती हैं।

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